सिकलसेल की रोकथाम के लिए जागरूकता आवश्यक


अनुसूचित जाति, जनजाति विकास मंत्री और स्कूल शिक्षा मंत्री श्री केदार कश्यप ने कहा कि सिकलसेल रोग का कोई ईलाज नहीं है। अतः इसकी रोकथाम के लिए लोगों को जागरूक होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विवाह पूर्व सिकलसेल की जॉंच कराने से इस रोग से बचा जा सकेगा। श्री कश्यप आज ठाकुर प्यारेलाल पंचायत एवं ग्रामीण विकास संस्थान के सभागृह में सिकलसेल एनीमिया तथा जलाशयों की स्थिति पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर व्यक्त किए। यह आयोजन भारत सरकार जनजाति कार्य मंत्रालय एवं छत्तीसगढ़ राज्य के अनुसूचित जाति, जनजाति विकास विभाग के सहयोग से किया जा गया है। आदिम जाति, अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग एवं अल्प संख्यक कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव श्री एन.के.असवाल, आयुक्त श्री एन.के.खाखा, सचिव श्री के. मुरूगन, संयुक्त सचिव श्री डी.डी. कुजाम उपस्थित थे।

अनुसूचित जाति, जनजाति विकास मंत्री श्री केदार कश्यप ने कहा कि सिकलसेल रोग के प्रति जन-जागरूकता लाने जनप्रतिनिधियों से पत्राचार कर अभियान चलाएंगें। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञों से परामर्श लेकर लोगों को सिकलसेल रोग से बचाव के लिए रक्त संबंधियों से विवाह नहीं करने प्रोत्साहित किया जाएगा। श्री कश्यप ने कहा कि विवाह का संबंध रक्त से है और अनुसूचित जनजाति वर्ग में रक्त संबंधियों में विवाह की पंरपरा है जिससे माता-पिता दोनों सिकलसेल रोग से प्रभावित हो रहे हैं, यह चिंता का विषय है। ऐसे क्षेत्रों में जहां मलेरिया आम तौर पर पाया जाता है, वहां मलेरिया की रोकथाम के लिए गंबूझिया मछली का उपयोग किया जाता है। उन्होंने कहा कि बस्तर में मलेरिया रोगी आम तौर पर बाहर से प्रभावित होकर आते हैं, जिसका प्रभाव बस्तर पर पड़ता है। श्री कश्यप ने कहा कि सिकल-सेल रक्ताल्पता एक आनुवंशिक रक्त विकार है जो ऐसी लाल रक्त कोशिकाओं के द्वारा हंसिया के समान होता है। यह क्रिया कोशिकाओं के लचीलेपन को घटाती है जिससे विभिन्न जटिलताओं का जोखिम उभरता है। इससे जीवन में कमी आ जाती है। जो लोग इस रोग से प्रभावित हैं वे संतान होने से पहले परामर्श जरूर लें। यह जांचने के लिए कि अजन्मे बच्चे को यह रोग है कि नहीं, रक्त का नमूना परीक्षण के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

भारत सरकार जनजाति कार्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्री मनोज पिंगुआ ने कहा कि सिकलसेल रोग आमतौर पर बाल्यावस्था में उत्पन्न होता है। यह प्रायः ऐसे लोगों में पाया जाता है जहां मलेरिया सामान्यतः पाया जाता है। उन्होंने कहा कि इसका ईलाज नहीं है, लेकिन नियंत्रण के लिए जागरूकता जरूरी है। सिकलसेल आनुवंशिक रोग है। माता-पिता से उसी रूप में विरासत में बच्चों को प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों में विवाह पूर्व रक्त की जॉंच कराकर इसकी जानकारी दिसंबर तक पूर्ण करा लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि जो लोग इस रोग के वाहक हैं वे संतान होने से पहले आनुवांशिक परामर्श से गुजरते हैं। यह जांचने के लिए कि एक अजन्मे बच्चे को यह रोग है कि नहीं। खून का नमूना लेने के बाद परीक्षण का इस्तेमाल किया जाता है। इस रोग की रोकथाम के लिए लोगों का जागरूक होना आवश्यक है, तभी इस पर नियंत्रण हो सकेगा। उन्होंने कहा कि आदिवासी विकास विभाग, मत्स्य पालन और सिंचाई विभाग के सहयोग से संसाधनों का प्रयोग कर जागरूकता लाने में मदद कर सकते हैं, जिससे छोटे जल स्रोतो का प्रयोग मछली पालन के लिए किया जा सकता है। मछलियां मच्छरों के लार्वे को भोजन के रूप में उपयोग करती हैं, जिससे मलेरिया जैसी बीमारियों पर नियंत्रण हो सकता है। सिकलसेल एनीमिया तथा जलाशयों की स्थिति पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, उप संचालक मत्स्य पालन, मृदा संरक्षण अधिकारी, सहायक आयुक्त आदिवासी विकास, परियोजना अधिकारी शामिल थे।